Sunday, March 30, 2008

Prathana - Prayer - As Expression of Gratitude



Prathana - Prayer - As Expression of Gratitude

Prayer is an expression of thanks, gratitude and confidence in God. Ordinarily, prayers are said with some objectives in mind. God is the greatest giver of all givers and He certainly gives, but the person offering prayers should have some patience and have peace of mind until he gets the reward. Don't ever imagine that if you have not been rewarded, your prayers have not been heard. The god has already accepted your prayers but the rewards will come at the proper time. You have planted a tree today, given it water and fertilizer over a short time. It does not mean that it will give you the fruits today itself or in a short while. There is no way to coax the plant to mature quickly and before its time. God's command is such that the tree will bear fruit at the designated time - not before and not after. In the same way, on the creeper of the prayers the flowers and the fruits will come - but at the appropriate time.


Saturday, December 1, 2007

Monthly Prathana in Jeewan Sanchetana



The Jeewan Sanchetana is Montly Publication of Vishwa Jagriti Mission, Delhi.

Sunday, November 11, 2007

हे प्रभु। सारा संसार ही तेरा परिवार है।


हे जगत के नियन्ता जगदीश्वर। हे नारायण। हे शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव। हे जन्म और जीवन देने वाले परमपिता परमात्मा। हम सभी भक्तों का श्रद्धा भरा प्रणाम आपके श्रीचरणों में स्वीकार हो। हे प्रभु। सारा संसार ही तेरा परिवार हे, तेरे चरणों में आनंद का वास हव, सभी के ह्रदयों में आपका निवास है।

हे प्रभु। जिस मेधा बुद्धि को हमारे पूर्ववर्त्ती ज्ञानी-ध्यानी तथा योगीजनों ने प्राप्त किया और अपना कल्याण किया उसी विशेष बुद्धि को आप हमें प्रदान करें

हे प्रभु हमें वह बुद्धि दो जिसके द्वारा हम सन्मार्ग पर चलकर आदर्श को धारण कर सकें तथा दोषों का परित्याग करें।

हे प्रभु। हमारे बुद्धि के रथ को आप हांकने वाले बनें। हम सदैव अच्छा विचारें, अच्छे योजनाएं बनाएं, अच्छे हो जाएँ और संसार को सुंदर बना सकें। खुद तरें और औरों को भी तारें। हे दाता हमारी यही विनंती हे, इसे आप स्वीकार कीजिए।


आचार्य सुधांशु जी महाराज


जीवन संचेतना नवम्बर २००७

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Friday, October 19, 2007

हे प्रभु हमारा ह्रदय आपके श्री चरणों से जुडे रहें

हे जीवन के आधार। सुख स्वरूप सचिदानंद परमेशवर। समस्त संसार में आपने अपनी कृपाओं को बिखेरा हुआ है। हमारा क्षद्धा भरा प्रणाम आपके श्रीचरणों में स्वीकार हो। हे प्रभु। जब हम अपने अंतर्मन में शान्ति स्थापित करते हैं तब हमारे अन्त:स्थ में आपके आनन्द की तरंगें हिलोरें लेने लगती हैं और हमारा रोम-रोम आनन्द से पुलकित होने लगता है। जिससे हमारा व्यवहार रसपूर्ण और प्रेमपूर्ण हो जाता है।

हे प्रभु! हमारा ह्रदय आपसे जुडा रहे, हम पर आपकी कृपा बरसती रहे, हमारा मन आपके श्रेचार्नोनें लगा रहे, यह आशीर्वाद हमें अवश्य दो। ताकि हम पर हर दिन नया उजाला, नई उमंगें, नया उल्लास लेकर जीवन के पथ पर अग्रसर हो सकें ! ऐसी हमारे ऊपर कृपा कीजिए।
हे दयालु दाता। हमें ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि हम प्रत्येक दिन को शुभ अवसर बना सकें। प्रत्येक दिन की चुनौती का सामना करने के लिए हमें ऐसी शक्ति प्रदान कीजिए कि जिससे हम संघर्ष में विजयी हों। हमारे द्वारा संसार में कुछ भी बुरा न हो, प्रेमपूर्ण वातावरण में श्वास ले सकें तथा प्रेम को संपूर्ण संसार में बाँट सकें

हे प्रभु! हमें यह शुभाशीष दीजिए। यही आपसे हमारी विनती है, यही याचना है। इसे स्वीकार कीजिए।


आचार्य सुधांशु जी माहाराज

जीवन संचेतना अक्टूबर २००७


Thursday, October 4, 2007

श्री कृष्ण जीं की प्रार्थना


है प्रभू ! तेरा भरोसा ही संसार का सहारा है



है सच्चिदानंद स्वरूप ! है शुद्ध ,बुद्ध युक्त स्वभाव ! है समस्त जगत को ज्ञानाम्रृत का पान कराने वाले गोविन्द !हम सभी भक्तों का श्रृद्धा भरा प्रणाम स्वीकार हो ! है प्रभु ! तेरा भरोसा ही संम्पूर्ण संसार का सहारा हो ! तेरा अतिशय ,अनन्य प्रेम सभी जीवों के ऊपर अनवरत बरसता है ! हम सदैव अपने चित्त को योग युक्त सत्ता का सत्ता का ध्यान करते रहें !
हे संसार के कण कण में बसने वाले सर्वव्यापक ,जगत के नियन्ता श्रीकृष्ण ! आप परम दयालु हो ,न्यायकारी हो , सुई की नोक का लाखवां हिस्सा भी किसी को कम या अधिक नहीं देते ! हम अल्पज्ञ हैं ,अज्ञानी हैं ,कर्म की छोटी सी चोट से ही हमारे कदम लड़खड़ा जाते हैं ! ऎसी विषम परिस्थिति में भी तुम ही दया करते हो ! निराशा के क्षणों में आशा प्रदान करते हो , निर्बलता में आत्मबल बनकर हमारे अंग संग रहते हो और जब हमारा मन विषाद में ड़ूबजाता हे तब आप प्रसन्नता का प्रसाद प्रदान करते हो !
हे जगदाधार !इस नश्वर संसार में आप ही सर्वज्ञाता हो ,शब्ततीत हो फिर भी इन्सान तुम्हें शब्दों से बांधने का निरर्थक प्रयास कर्ता है ! तेरे चरणों में तो केवल भावनाओं की भनक ही पहुँचती है ! हे भगवान ! मेरा रोम रोम तुम्हें पुकारता रहे ,मेरा ह्रदय प्रेममय हो जाए ,मेरे हाथ परोपकारी होन ,मेरी द्रष्टि सकारात्मक हो जाए और में श्रद्धा का आसान बिछाऊं ,मुझे एसी अनुपम अनुभूती हो जाए कि मेरा देव मेरे सम्मुख खडा है और में आनन्दित होकर चरण वंदना कर रहा हूँ ! हे प्रभु ऐसा आशीर्वाद प्रदान कीजिए यही प्रार्थना गई ,याचना है , स्वीकार कीजिए ,सबका बेडा पार कीजिए !
ॐ शान्ति !शान्ति ! शान्ति
आचार्य सुधांशु जीं महाराज
जीवन संचेतना सितंबर २००७



Saturday, September 29, 2007

देवों के देव महादेव



हे देवाधिदेव महादेव ! हे सच्ग्क्गीदानंद! काल आपके अधीन है ,आप काल से मुक्त हैं ! जिसे मृत्यु जीतनी है ,उसे तो आपमें स्थित होना चाहिय ! आपका मन्त्र मृत्युँजय है !

है शंकर ! है शिवा ! आप त्र्यम्बक अर्थात तीन नेत्रों वाले हैं ! सत्यम ,शिवम और सुन्दरम आपके तीन नेत्र हैं ! आप ज्ञान ,कर्म और भक्ती को धारण करते हैं !भू:, भुव: और स्व: -भूमि ,अंतरिक्ष ,और धुलोक सब आपमें ही व्याप्त है ! जीवन ,मृत्यु और मुक्ति तीनों ही आपके नेत्र हैं ! आप बालचन्द्र ,गंगा और शक्ति -तीनों को धारण करते है ! आप जग का कल्याण करते हैं ! प्रभु ! हम कल्याण मार्ग के पथिक बनें ,यह हमारी विनती है !
ॐ शान्ति : शान्ती : शान्ति :

आचार्य सुधांशु जीं महाराज
जीवन संचेतना फ़रवरी २००४ से

Wednesday, September 26, 2007

आप ही ज्योतिमर्य है

आप ही ज्योतिमर्य है

हे प्रभु! हे जीवन के आधार! हे दयालुदेवा! आप ही ज्योतिमर्य है, आप प्रकाशस्वरूप है, इसलिये हम विनंती करते है। प्रभु! 'असतो माँ सद्गमय तमसो माँ ज्योतिम्रमय म्रुत्योम्रा अमृतं गमय!' हे प्रभु! जो असत है, उस असत के पथ से हमको सुपथ पर लेकर चलिए। जो मार्ग हमको भटकाते है, जिन मार्गो पर चलते - चलते जीवन के ल्क्ष्य से हम दूर हो जाये, विनाशशील संसार मे विनाश करने के लिए उर्जा को, अपनी शक्तिं को लगाते रह जाये, उस मार्ग से हमको अप बचाइए और जिस मार्ग पर चलने से हम अपने जीवन मे उन्नत हो, सूखी हो, प्रसन्न हो शांत हो, आनंदित हो, हे प्रभु! वही मार्ग हमको देना। है दयालुदेव! हमारी विनंती है कि जो अँधेरा है उसके पर हम निकल सकें अपने अंधेरों के पार निराशा के पार, दुख के पार। अपनी उलझनो के पार समंस्य़ायों से दूर आगे बढकर इन सब स्थितियों को जीतकर जो प्रकाश का मार्ग है, उसका अवलंबन करे। दयालु देव! हमारी यह भी याचना है कि जो पीडा है, दुःख है, संताप है, उस सबसे हम ऊपर उठ जाये, उससे बच सके परम अमृत को प्राप्त क्र सके, ऐसी दिशा हमको दीजिए हमारी मति को सुमति बनाये यही विनती है हमारी। कृपया इसे स्वीकार कीजिये